रस और धà¥à¤µà¤¨à¤¿ सिदà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤¤ की मनोवैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ता

संध्या त्रिपाठी, छाया रानी

Abstract


पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨Â  साहितà¥à¤¯à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯ गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥à¥‹à¤‚ से लेकर आधà¥à¤¨à¤¿à¤• काल तक के जो भी साहितà¥à¤¯ शासà¥à¤¤à¥à¤° के गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤£à¤¯à¤¨ हà¥à¤† है उनमें साहितà¥à¤¯à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की मनोवैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ता सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿà¤¤à¤¯à¤¾ पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¿à¤¤ हà¥à¤ˆ है। इसका विसà¥à¤¤à¥ƒà¤¤ विवेचन भारत मà¥à¤¨à¤¿ से ही आरमà¥à¤­ हो जाता है, जिसको अनेक परवरà¥à¤¤à¥€ आचारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ ने भी गà¥à¤°à¤¹à¤£ किया है। रस के सनà¥à¤¦à¤°à¥à¤­ में तो यह और भी महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£Â  हो जाता है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ कि कवि या कावà¥à¤¯à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°à¥€ मानव मन का अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ किये बिना अपने कृतà¥à¤¯ में सफल नहीं हो सकता है। रस सिदà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤¤ की पृषà¥à¤ à¤­à¥‚मि भी हमारी सूकà¥à¤·à¥à¤® मानसिक वृतà¥à¤¤à¤¿ पर आधारित है। विभाव, अनà¥à¤­à¤¾à¤µ, वà¥à¤¯à¤­à¤¿à¤šà¤¾à¤°à¥€ भाव, à¤à¤• चेतन मन की ही कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤¯à¥‡à¤‚ हैं तथा अनेक पà¥à¤°à¤•ार के जो भी कावà¥à¤¯à¤—त, रसगत, व साहितà¥à¤¯à¤—त विचार है वे मन की विशेष मनोदशा के परिचायक हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि रस व धà¥à¤µà¤¨à¤¿ सिदà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤¤ के मूल में मानसिक वà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤¾à¤®Â  की पराकाषà¥à¤ à¤¾ परिलकà¥à¤·à¤¿à¤¤ होती है जो पूरà¥à¤£ मनोवैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• है।

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