तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸ जी के कावà¥à¤¯ में पà¥à¤°à¤•ृति सौनà¥à¤¦à¤°à¥à¤¯
Abstract
मानव जीवन वैसे तो समसà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤•ृति की गोद में ही गà¥à¤œà¤°à¤¤à¤¾ है सारी घटनाà¤à¤‚ इसी के आंगन में घटित होती है। मानव पà¥à¤°à¤•ृति की गोद में ही आंखें खोलता है व इसी की गोद में अंतिम सांस लेकर सो जाता है। तो हमारे कावà¥à¤¯ निरूपण में कवि कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ पà¥à¤°à¤•ृति से अछूते रहते। और गोसà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸ जी तो सदैव इसके साथ नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ किया। कावà¥à¤¯ में पà¥à¤°à¤•ृति वरà¥à¤£à¤¨ से तातà¥à¤ªà¤°à¥à¤¯ उन वसà¥à¤¤à¥à¤“ं के वरà¥à¤£à¤¨ से है जो मानव निरà¥à¤®à¤¿à¤¤ न होकर सहज नैसरà¥à¤—िक सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में होता है। जैसे वन, परà¥à¤µà¤¤, सरिता, पृथà¥à¤µà¥€, सागर, आकाश आदि। कवि वनसà¥à¤ªà¤¤à¤¿ शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ या à¤à¥‚गोलवेतà¥à¤¤à¤¾ की à¤à¤¾à¤‚ति पà¥à¤°à¤•ृति का अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ या जानकारी पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने हेतॠनहीं करता न वह पà¥à¤°à¤•ृति को जà¥à¤žà¤¾à¤¨ या अरà¥à¤¥à¤¬à¥‹à¤§ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से देखता वरनॠवह अपनी संवेदनाओं व अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ तथा कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾à¤“ं को आकार देने के उदशà¥à¤¯ से ही पà¥à¤°à¤•ृति को केनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¿à¤¤ करके कावà¥à¤¯ रचना करता है।
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