हिंदी दलित आतà¥à¤®à¤•थाओं में मानवता की पà¥à¤•ार
Abstract
सà¤à¥à¤¯ समाज का आधार नैतिक मानदंडो पर आधारित होता है। जिसमें सà¥à¤µà¤¤à¤¨à¥à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤¤à¤¾, समानता, बंधà¥à¤¤à¤¾ व मानवीयता आदि मूलà¥à¤¯ समाज को नियनà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¤ व सà¥à¤šà¤¾à¤°à¥‚ रूप से चलाने के लिठआवशà¥à¤¯à¤• होते हैं। लेकिन आधà¥à¤¨à¤¿à¤• यà¥à¤— के आपा-धापी व à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤•वादी जीवन में ये मानवीय मूलà¥à¤¯ लà¥à¤ªà¥à¤¤ होते जा रहे हैं। औदà¥à¤¯à¥‹à¤—िकरण की नई परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ ने मानवीय समà¥à¤¬à¤‚धों, संसà¥à¤•ारों और मानसिकता में परिवरà¥à¤¤à¤¨ ला दिया है। अगर दलित समाज के सनà¥à¤¦à¤°à¥à¤ में इन मानवीय मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ का अवलोकन किया जाठतो सà¤à¥à¤¯ समाज ने इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ कà¤à¥€ मनà¥à¤·à¥à¤¯ समà¤à¤¾ ही नहीं। इसने साथ पशॠसे बदतर वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° किया जाता रहा है। असमानता, शोषण, अतà¥à¤¯à¤¾à¤šà¤¾à¤° व अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯ पर आधारित à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ समाज ने दलितों को मातà¥à¤° गरीबी, à¤à¥‚खमरी, गà¥à¤²à¤¾à¤®à¥€, अशिकà¥à¤·à¤¾ आदि परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में जीने को मजबूर किया है। समसà¥à¤¤ मानवाधिकार से वंचित यह वरà¥à¤— सवरà¥à¤£ समाज की हिंसक पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¤¿ का शिकार रहा है। सवरà¥à¤£ समाज की इसी रकà¥à¤¤ चूषक पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¤¿ का दलित आतà¥à¤®à¤•थाओं में वरà¥à¤£à¤¨ हà¥à¤† है। जहां दलित समाज की लाचारी व बेबसी का चितà¥à¤°à¤£ तो है ही साथ ही साथ सवरà¥à¤£ समाज की संवेदनहीनता का बोध à¤à¥€ होता है।
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