पà¥à¤°à¥‡à¤® और समरà¥à¤ªà¤£ के लोककविः कबीर
Abstract
हिनà¥à¤¦à¥€ साहितà¥à¤¯ इतिहास के काल विà¤à¤¾à¤œà¤¨ में à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ काल को साहितà¥à¤¯ के सà¥à¤µà¤°à¥à¤£-यà¥à¤— के रूप में विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤¿à¤¤ किया जाता है। हिनà¥à¤¦à¥€ साहितà¥à¤¯ का सौà¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ है कि इसी à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ काल में रामाशà¥à¤°à¤¯à¥€ à¤à¤•à¥à¤¤ कवियों में सरà¥à¤µà¤¶à¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸ मिले जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दशरथ पà¥à¤¤à¥à¤° राम के आदरà¥à¤¶à¤®à¤¯à¥€ जीवन का लोककलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤•ारी रूप ’रामचरित मानस’ के रूप में अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ किया। यह सरà¥à¤µà¤µà¤¿à¤¦à¤¿à¤¤ है कि ’रामचरित मानस’ à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ जन मानस का शिरोमणी गà¥à¤°à¤‚थ है जिसे साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• à¤à¤µà¤‚ धारà¥à¤®à¤¿à¤• दोनों रूपों में सरà¥à¤µà¤¶à¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ माना गया है। ’तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸â€™ के अतिरिकà¥à¤¤ कृषà¥à¤£ à¤à¤•à¥à¤¤ कवियों में नेतà¥à¤°à¤¹à¥€à¤¨ सूरदास का जिकà¥à¤° ’वातà¥à¤¸à¤²à¥à¤¯ रस’ के समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ के रूप में बडे ही आदर के साथ लिया जाता है। इनके साथ इस यà¥à¤— में सूफी कावà¥à¤¯ मत के अंतरà¥à¤—त ’पदà¥à¤®à¤¾à¤µà¤¤à¥€â€™ के रचयिता मलिक महोमà¥à¤®à¤¦ जायसी ने मानवीय रूपकों के माधà¥à¤¯à¤® से अननà¥à¤¤ अगोचर परमातà¥à¤®à¤¾ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ हेतू संघरà¥à¤·à¤¶à¥€à¤² वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ और कवि का सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया। जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤¾à¤·à¤¾ के गूढतम रूप में कविता न करके अवधि के ठेठरूप का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया। उपरोकà¥à¤¤ सà¤à¥€ महानà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ मे à¤à¥€ शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ तम संत कबीर निरगà¥à¤£à¥‹à¤ªà¤¾à¤¸à¤¨à¤¾ के पहले à¤à¤¸à¥‡ कवि हà¥à¤ हैं जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जीवन के पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ असंगतियों, रूढà¥à¤¤à¤¾ - जडà¥à¤¤à¤¾ à¤à¤µà¤‚ अशोà¤à¤¨à¥€à¤¯ की ना केवल आलोचना की अपितॠइसके साथ ही साथ सà¥à¤µà¤‚य अपने जीवन में उसे कारà¥à¤¯à¤°à¥‚प में मूरà¥à¤¤ कर लोगों के सामने आदरà¥à¤¶ à¤à¥€ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया। इसलिठहिनà¥à¤¦à¥€ के पहले लोककवि होने का शà¥à¤°à¥‡à¤¯ उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ ही जाता है।
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