मधà¥à¤¯à¤•ालीन नाटकों में नारी की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ à¤à¤• अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨
Abstract
यदि à¤à¤¾à¤°à¤¤ के पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ इतिहास का अवलोकन करें तो दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤—त होता है कि सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ में सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯à¥‹à¤‚ का सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ महतà¥à¤¤à¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ रहा है। हिनà¥à¤¦à¥ समाज में उनका समà¥à¤®à¤¾à¤¨ और आदरà¥à¤¶ पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ काल से आदरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• और मरà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾à¤¯à¥à¤•à¥à¤¤ था। उनकी सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¥à¤·à¥‹à¤‚ के समान थी। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ विवाह, शिकà¥à¤·à¤¾, समà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ में अधिकार पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ थे। परिवार में उनके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ कनà¥à¤¯à¤¾, पतà¥à¤¨à¥€, वधू और माठके रूप में किये जाने वाले योगदान का शà¥à¤°à¥ƒà¤¦à¥à¤§à¤¾, महतà¥à¤¤à¥à¤µ और समà¥à¤®à¤¾à¤¨ था। किनà¥à¤¤à¥ सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की दशा में यà¥à¤— के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° परिवरà¥à¤¤à¤¨ à¤à¥€ होता रहा है। उसकी सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में वैदिक यà¥à¤— से लेकर पूरà¥à¤µ-मधà¥à¤¯à¤•ाल तक अनेक उतार-चà¥à¤¾à¤µ आते रहे हैं तथा उनके अधिकारों में इसी पà¥à¤°à¤•ार परिवरà¥à¤¤à¤¨ à¤à¥€ होते रहे हैं। नारी समाज का अà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ अंग है। किस à¤à¥€ समाज की उनà¥à¤¨à¤¤à¤¿ उस समय तक पूरà¥à¤£ नहीं मानी जाती जब तक उसमें सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को पूरà¥à¤£ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ ना मिले। नारी की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ का मापदणà¥à¤¡ है। समाज के सà¥à¤¤à¤° पर अनेक à¤à¥‚मिकाओं के साथ ही माता, बहन, पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€, पà¥à¤°à¥‡à¤¯à¤¸à¥€, दोसà¥à¤¤ तथा वैशà¥à¤¯à¤¾ तक जाती है। वह किसी न किसी रूप में अवशà¥à¤¯ ही चितà¥à¤°à¤¿à¤¤ होती है। वासà¥à¤¤à¤µ में गृहसà¥à¤¥à¤¾à¤¶à¥à¤°à¤® की सफलता नारी पर आधारित है। पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ शोध विषय में नाटकों के आधार पर नारी की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ की इन विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ रूपों को दिखाने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है।
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