‘काला पहाड़’ : सामà¥à¤ªà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤¿à¤• सौहारà¥à¤¦ की विरासत का दसà¥à¤¤à¤¾à¤µà¥‡à¤œ

डॉ० सतीश कुमार

Abstract


हमारा देश आज सामाजिक, आरà¥à¤¥à¤¿à¤• और राजनीतिक तनाव से गà¥à¤œà¤° रहा है। à¤à¤• ओर जहाठअनेक राजनीतिक पारà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ फैलाया जाने वाला जातिवाद है तो दूसरी ओर धारà¥à¤®à¤¿à¤• अलà¥à¤ªà¤¸à¤‚खà¥à¤¯à¤•ों के खिलाफ किया जाने वाला घृणित और जघनà¥à¤¯ कà¥à¤•रà¥à¤® है। ‘‘इस तनावपूरà¥à¤£ माहौल में भगवानदास मोरवाल का उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ ‘काला पहाड़’ सà¥à¤•ून तो देता ही है, यह जानकर तसलà¥à¤²à¥€ होती है कि अभी बिलकà¥à¤² अंधेरा नहीं हà¥à¤† है; रोशनी नजर आ रही है। इस समाज में पà¥à¤°à¤—तिशील चेतना से यà¥à¤•à¥à¤¤ लोग मौजूद हैं, जो इस समाज को इन ताकतों से लड़ने का साहस रखते हैं। सलेमी (इस उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ का केनà¥à¤¦à¥à¤°à¥€à¤¯ पातà¥à¤°) जैसे लोग इस समाज में मौजूद हैं जो निरंतर जातिवादी और संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤µà¤¾à¤¦à¥€ शकà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से संघरà¥à¤· कर रहे हैं।’’1


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