‘बाल-दिवस’ में बालमन को उकेरती कहानियॉं-à¤à¤• अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨

डॉ. आशुतोष

Abstract


भौतिकतावाद, शहरीकरण, औधोगिकरण, आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता की दौड़, इनà¥à¤«à¤¾à¤°à¤®à¥‡à¤¶à¤¨ टेकà¥à¤¨à¥‹à¤²à¥‰à¤œà¥€ का बà¥à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤­à¤¾à¤µ, अनेको कारण है जिनसे आज का यà¥à¤— मशीनीकरण में तबदील हो गया। बदलते परिवेश मे जहॉं अनेक परिरà¥à¤µà¤¤à¤¨ हà¥à¤ वहॉं अधà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤•िय जीवन, शिकà¥à¤·à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने वाले बचà¥à¤šà¥‡ और शिकà¥à¤·à¤¾ के सà¥à¤¤à¤° में भी परिरà¥à¤µà¤¤à¤¨ हà¥à¤† हैं। आधà¥à¤¨à¤¿à¤• संदरà¥à¤­ में अधà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• और अभिभावक भाग-दौड़ भरी जिनà¥à¤¦à¤—ी में बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को परà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ समय नही दे पा रहे हैं। सहसà¥à¤¤à¥à¤° पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ो के सजृन करने वाले साहितà¥à¤¯à¤•ार डॉ0 मधà¥à¤•ानà¥à¤¤ ने अपने कहानी संगà¥à¤°à¤¹ ‘बाल-दिवस’ में बाल उतà¥à¤ªà¥€à¥œà¤¨, बाल शोषण, अकेलापन, भà¥à¤°à¤·à¥à¤Ÿà¤¾à¤šà¤¾à¤°, मानवीय संवेदनाओं का गिरता सà¥à¤¤à¤°, आदि मानव मसà¥à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤• को संकà¥à¤šà¤¿à¤¤, अविशà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥€ और विषाकà¥à¤¤ बनाने वाली समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं को उकेरा है। बालको के सरà¥à¤µà¤¾à¤‚गीन विकास के लिठलेखक सà¥à¤µà¤¯à¤‚ लिखते है ‘बालक को आजाद करना होगा, उसकी जिजà¥à¤žà¤¾à¤¸à¤¾à¤“ं को, सवालों को, धैरà¥à¤¯à¤ªà¥‚रà¥à¤µà¤• हल करना होगा, उनके साथ बैठना, खेलना और उनका दोसà¥à¤¤ बनना होगा ताकि वे ड़रे नही अपनी मन की बात कह सके।

Full Text:

PDF




Copyright (c) 2018 Edupedia Publications Pvt Ltd

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.

 

All published Articles are Open Access at  https://journals.pen2print.org/index.php/ijr/ 


Paper submission: ijr@pen2print.org