‘बाल-दिवस’ में बालमन को उकेरती कहानियॉं-à¤à¤• अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨
Abstract
à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤•तावाद, शहरीकरण, औधोगिकरण, आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता की दौड़, इनà¥à¤«à¤¾à¤°à¤®à¥‡à¤¶à¤¨ टेकà¥à¤¨à¥‹à¤²à¥‰à¤œà¥€ का बà¥à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ, अनेको कारण है जिनसे आज का यà¥à¤— मशीनीकरण में तबदील हो गया। बदलते परिवेश मे जहॉं अनेक परिरà¥à¤µà¤¤à¤¨ हà¥à¤ वहॉं अधà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤•िय जीवन, शिकà¥à¤·à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने वाले बचà¥à¤šà¥‡ और शिकà¥à¤·à¤¾ के सà¥à¤¤à¤° में à¤à¥€ परिरà¥à¤µà¤¤à¤¨ हà¥à¤† हैं। आधà¥à¤¨à¤¿à¤• संदरà¥à¤ में अधà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• और अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• à¤à¤¾à¤—-दौड़ à¤à¤°à¥€ जिनà¥à¤¦à¤—ी में बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को परà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ समय नही दे पा रहे हैं। सहसà¥à¤¤à¥à¤° पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ो के सजृन करने वाले साहितà¥à¤¯à¤•ार डॉ0 मधà¥à¤•ानà¥à¤¤ ने अपने कहानी संगà¥à¤°à¤¹ ‘बाल-दिवस’ में बाल उतà¥à¤ªà¥€à¥œà¤¨, बाल शोषण, अकेलापन, à¤à¥à¤°à¤·à¥à¤Ÿà¤¾à¤šà¤¾à¤°, मानवीय संवेदनाओं का गिरता सà¥à¤¤à¤°, आदि मानव मसà¥à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤• को संकà¥à¤šà¤¿à¤¤, अविशà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥€ और विषाकà¥à¤¤ बनाने वाली समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं को उकेरा है। बालको के सरà¥à¤µà¤¾à¤‚गीन विकास के लिठलेखक सà¥à¤µà¤¯à¤‚ लिखते है ‘बालक को आजाद करना होगा, उसकी जिजà¥à¤žà¤¾à¤¸à¤¾à¤“ं को, सवालों को, धैरà¥à¤¯à¤ªà¥‚रà¥à¤µà¤• हल करना होगा, उनके साथ बैठना, खेलना और उनका दोसà¥à¤¤ बनना होगा ताकि वे ड़रे नही अपनी मन की बात कह सके।
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