à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास में जाति वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ का विकास 1500 ई.पू. से 300 ई.पू. तक
Abstract
जाति व वरà¥à¤£ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास में उदà¥à¤à¥‚त हà¥à¤. इसका सीधा समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ और समाज से है. यह जनà¥à¤® मूलक नहीं है. पà¥à¤°à¤•ृति किसी à¤à¥€ मनà¥à¤·à¥à¤¯ को जाति का तमगा लगा कर नहीं à¤à¥‡à¤œà¤¤à¥€ है. यह नितांत मानव का आविषà¥à¤•ार है. वरà¥à¤£ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के रचनाकार कहते हैं कि इसकी सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ समाज के सही निरà¥à¤®à¤¾à¤£ के लिठकी गयी थी. जिसका सबसे पहला पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ हमें ऋगà¥à¤µà¥‡à¤¦ के काल में मिलता है.[1] जाति वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ हालांकि वरà¥à¤£ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ से ही हà¥à¤† लेकिन इसमें मौलिक à¤à¥‡à¤¦ है. वरà¥à¤£à¤¸à¤‚करता जाति वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ का मूल कारण है.  जाति वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ का विकास हम उतà¥à¤¤à¤° वैदिक काल में पाते हैं.[2] गà¥à¤ªà¥à¤¤ काल तक आते आते वरà¥à¤£ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ अपनी पूरी सà¥à¤šà¤¿à¤¤à¤¾ खो बैठती है और समाज में अनेक à¤à¤¸à¥€ जातियां सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ लेती हैं जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ से बाहर रखा जाता था. à¤à¤¸à¥€ जातियों को अनà¥à¤¤à¥à¤¯à¤œ कहा गया है. अलबरूनी à¤à¥€ इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ ‘चंडाल’ की संजà¥à¤žà¤¾ देता है. इनके पास न ही नागरिक अधिकार थे और न ही क़ानूनी. इस शोध पतà¥à¤° में मैंने जाति वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के विकास को ३०० ई.पू. तक विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤¿à¤¤ करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है तथा साथ ही साथ समाज पर इसके पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥‹ का उलà¥à¤²à¥‡à¤– à¤à¥€ किया है. उंच-नीच, छà¥à¤†-छूत, à¤à¥‡à¤¦-à¤à¤¾à¤µ आदि सामाजिक कà¥à¤°à¥€à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤ जाति वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के ही परिणाम हैं.
[1] ऋगà¥à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• काल १५००-१००० ई.पू. का काल है.
[2] उतà¥à¤¤à¤° वैदिक काल का समय ऋगà¥à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• काल के बाद शà¥à¤°à¥‚ होता है, इसका समय है १०००-६०० ई.पू.
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