उतà¥à¤¤à¤°à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• काल में भारत की सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾

सन्दीप मलिक

Abstract


वसà¥à¤¤à¥à¤¤à¤ƒ वैदिक साहितà¥à¤¯ से पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ सामगà¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के आधार पर जिस सभà¥à¤¯à¤¤à¤¾ का जà¥à¤žà¤¾à¤¨ हà¥à¤† है, उसे उतà¥à¤¤à¤°à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• सभà¥à¤¯à¤¤à¤¾ कहा जाता है। यदà¥à¤¯à¤ªà¤¿ वैदिक साहितà¥à¤¯ रचना के समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ में तो काफी मतभेद हैं परनà¥à¤¤à¥ ऋगà¥à¤µà¥‡à¤¦à¤•ालीन साहितà¥à¤¯ का अनà¥à¤¤à¤¿à¤® समय 12से 11 सदी ई0पू0 माना जाता है, अतः इसके बाद सामवेद, यजà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦, अथरà¥à¤µà¤µà¥‡à¤¦ संहिता, बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£ गà¥à¤°à¤‚थ, अरणà¥à¤¯à¤•, उपनिषद तथा सूतà¥à¤° गà¥à¤°à¤‚थ आदि की रचना होने से वैदिक साहितà¥à¤¯ में अपार वृदà¥à¤§à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤ उतà¥à¤¤à¤°à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• काल में आरà¥à¤¯ लोग सà¥à¤¦à¥‚र पूरà¥à¤µ और दकà¥à¤·à¤¿à¤£ दिशा की तरफ फैल गठथे। उतà¥à¤¤à¤°à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• साहितà¥à¤¯ में इस बात का भी उलà¥à¤²à¥‡à¤– है कि जैसे-जैसे आरà¥à¤¯ लोग पूरà¥à¤µ दिशा में बढे तथा नगरों का विकास हà¥à¤†, परिणामसà¥à¤µà¤°à¥‚प पंचाल, कोशल, विदेह, मगध तथा अंग जैसे नगरों का बसना पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤­ हो गया। अतः उतà¥à¤¤à¤°à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• साहितà¥à¤¯ से पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ साकà¥à¤·à¥à¤¯à¥‹à¤‚ के आधार पर यह बात सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ हो गई है कि इस काल में नगरीय जीवन आरमà¥à¤­ हà¥à¤†à¥¤ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ शोध पतà¥à¤° में उतà¥à¤¤à¤°à¤µà¥ˆà¤¦à¤¿à¤• काल में भारत की सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ पर पà¥à¤°à¤•ाश डाला गया है।


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