पचपन खमà¥à¤¬à¥‡ लाल दीवारे’ में नारी चेतना
Abstract
उषा पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤µà¤‚दा की गणना हिनà¥à¤¦à¥€ के उन कथाकारों में होती हैं जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने आधà¥à¤¨à¤¿à¤• जीवन की ऊब,छटपटाहट, संतà¥à¤°à¤¾à¤¸ और अकेलेपन की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ को सà¥à¤µà¤¯à¤‚ अनà¥à¤à¤µ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ कियाहै। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में नारी जीवन के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पहलà¥à¤“ं का संजीव व मारà¥à¤®à¤¿à¤• चितà¥à¤°à¤£ हà¥à¤† है। ‘पचपन खमà¥à¤¬à¥‡ लाल दीवारें’ उषा पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤‚वदा का पहला उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ है। इसमें à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ नारी-जीवन के à¤à¤• लगà¤à¤— अछूते पहलू पर पà¥à¤°à¤•ाश डाला गया है। इसमें नारी की सामाजिक-आरà¥à¤¥à¤¿à¤• विवशताओं से जनà¥à¤®à¥€ मानसिक यंतà¥à¤°à¤£à¤¾ का बड़ा ही मारà¥à¤®à¤¿à¤• चितà¥à¤°à¤£ हà¥à¤† है। छातà¥à¤°à¤¾à¤µà¤¾à¤¸ के पचपन खमà¥à¤¬à¥‡ और लाल दीवारें उन परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• हैं जिनमें रहकर सà¥à¤·à¤®à¤¾ को ऊब तथा घà¥à¤Ÿà¤¨ का à¤à¤¹à¤¸à¤¾à¤¸ होता है, लेकिन वह उससे मà¥à¤•à¥à¤¤ नहीं हो पाती, शायद इन परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के बीच जीना ही उसकी नियति है।
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