मोहन राकेश का वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ à¤à¤µà¤‚ कृतितà¥à¤µ
Abstract
हिनà¥à¤¦à¥€ नाटक के कà¥à¤·à¤¿à¤¤à¤¿à¤œ पर मोहन राकेश का उदय उस समय हà¥à¤† जब सà¥à¤µà¤¾à¤§à¥€à¤¨à¤¤à¤¾ के बाद पचास के दशक में सांसà¥à¤•ृतिक पà¥à¤¨à¤°à¥à¤œà¤¾à¤—रण का जà¥à¤µà¤¾à¤° देश में जीवन के हर कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° को सà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¦à¤¿à¤¤ कर रहा था। उनके नाटकों ने न सिरà¥à¤« नाटक का आसà¥à¤µà¤¾à¤¦, तेवर और सà¥à¤¤à¤° ही बदल दिया, बलà¥à¤•ि हिनà¥à¤¦à¥€ रंगमंच की दिशा को à¤à¥€ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ किया। उसके पहले, à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥‡à¤¨à¥à¤¦à¥ हरिशà¥à¤šà¤¨à¥à¤¦à¥à¤° और जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ जैसे पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤¾à¤¨ रचनाकारों के बावजूद, हिनà¥à¤¦à¥€ नाटक अधिकांशत: या तो ससà¥à¤¤à¥‡ में मनोरंजन का साधन बना हà¥à¤† था या फिर नाटà¥à¤¯ पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों की दीवारों के पीछे बनà¥à¤¦ था। पचास के दशक में उसे धीरे-धीरे à¤à¤• अतà¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤ ही समरà¥à¤¥ किनà¥à¤¤à¥ जटिल और परिशà¥à¤°à¤® तथा पà¥à¤°à¤¶à¤¿à¤•à¥à¤·à¤£-साधà¥à¤¯ कला माधà¥à¤¯à¤® के रूप में सà¥à¤µà¥€à¤•ृति मिलना शà¥à¤°à¥‚ हà¥à¤†, और साथ ही नाटà¥à¤¯à¤•रà¥à¤®à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से à¤à¥€ अधिक जागरूकता संवेदनशीलता और कलातà¥à¤®à¤• गंà¤à¥€à¤°à¤¤à¤¾ की अपेकà¥à¤·à¤¾ होने लगी। 1958 में संगीत नाटक अकादेमी दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ मोहन रोकेश के नाटक आषाढ़ का à¤à¤• दिन को सरà¥à¤µà¤¶à¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ नाटक के लिठऔर कलकतà¥à¤¤à¥‡ की नाटà¥à¤¯à¤®à¤‚डली अनामिका को विनोद रसà¥à¤¤à¥‹à¤—ी के ‘नये हाथ’ के सरà¥à¤µà¤¶à¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤à¥€à¤•रण के लिठपà¥à¤°à¤¸à¥à¤•ारों में इस बदलती हà¥à¤ˆ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ की ही सà¥à¤µà¥€à¤•ृति थी। उसके बाद से हिनà¥à¤¦à¥€ नाटक लगातार आगे बढ़ता रहा है। और सारी सीमाओं के बावजूद उसके कà¥à¤°à¤®à¤¶: हिनà¥à¤¦à¥€ के सृजनातà¥à¤®à¤• साहितà¥à¤¯ के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में और देश के नाटक साहितà¥à¤¯ में सारà¥à¤¥à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ हासिल किया है।
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