संत साहितà¥à¤¯ में नैतिक मूलà¥à¤¯

कविता कुमारी

Abstract


शोध सार आलेख- पकà¥à¤°à¥ƒà¤¤à¤¿ कवि सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤¨à¤‚दन पतं जी के पà¥à¤°à¤•ृति के आलिगंन में आबदà¥à¤§ हाकेर नारी के रà¥à¤ª वैभव को भी ठà¥à¤•रा दिया विशà¥à¤µ केनव जाने कितने कवियो ंने पà¥à¤°à¤•ृति का चितà¥à¤°à¤£ अपने कावà¥à¤¯ मे ंकिया है। किनà¥à¤¤à¥ पà¥à¤°à¤•ृति के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ जैसा गहरा अनà¥à¤°à¤¾à¤— इस महाकवि का परिलकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤† है वैसा हमें किसी अनà¥à¤¯ में दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤—ोचर नहीं होता। पà¥à¤°à¤•ित उनक ेलिठकावà¥à¤¯ की वसà¥à¤¤à¥ और उनकी साज-सजà¥à¤œà¤¾ का साधन ही नहीं, अपति उनकी कावà¥à¤¯ पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ का सà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤¤ भी रही है। उनà¥à¤¹à¤¾à¤‚न ेसà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ शबà¥à¤¦à¥‹ ंमें सà¥à¤µà¥€à¤•ार किया है कविता करने की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ मà¥à¤à¥‡ सबसे पहल ेपà¥à¤°à¤•ृति निरीकà¥à¤·à¤£ से मिली है। जिसका शà¥à¤°à¥‡à¤¯ मेरी जनà¥à¤®-भूमि कà¥à¤°à¥à¤®à¤¾à¤šà¤² पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ को है। कवि जीवन से पहले भी मà¥à¤ ेयाद है, मैं घणà¥à¤Ÿà¥‹ ंà¤à¤•ानà¥à¤¤ में बैठा, पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक दृशà¥à¤¯à¤¾à¤‚ को à¤à¤• टक देखा करता था और कोई अजà¥à¤žà¤¾à¤¤ आकरà¥à¤·à¤£ मेरे भीतर à¤à¤• अवà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ सौंदरà¥à¤¯ का जाल बà¥à¤¨à¤•र मेरी चेतना को तनà¥à¤®à¤¯ कर देता था। जब कभी मैं आंखे मूदंकर लेटता था तो वह दृशà¥à¤¯à¤ªà¤Ÿ चà¥à¤ªà¤šà¤¾à¤ª मेरी आखà¥à¤¾à¤‚ं के सामने घà¥à¤®à¤¾ करता था और यह शायद पवरà¥à¤¤-पाà¥à¤°à¤¨à¥à¤¤ के वातावरण ही का पà¥à¤°à¤­à¤¾à¤µ है कि मेरे भीतर विशà¥à¤µ और जीनà¥à¤¸ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ à¤à¤• गमà¥à¤­à¥€à¤° आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯ की भावना, पवरà¥à¤¤ की तरह निशà¥à¤šà¤¯ रूप में अवसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है।

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