पà¥à¤°à¤•ृति के कà¥à¤¶à¤² चितेरे पंतजी
Abstract
संत कावà¥à¤¯à¤§à¤¾à¤°à¤¾ के दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤• - सांसà¥à¤•ृतिक आधार अनेक है। जिनमें से पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रà¥à¤ªà¥‡à¤£ उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है- उपनिषद, शंकराचारà¥à¤¯ का अदà¥à¤µà¥ˆà¤¤à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ नाथ पंथ, इसà¥à¤²à¤¾à¤® धरà¥à¤® तथा सà¥à¤«à¥€ दरà¥à¤¶à¤¨à¥¤ संत शबà¥à¤¦ का नाम आते ही हमारे मन में à¤à¤• साफ-सà¥à¤¥à¤°à¥€ व मनमोहक छवि आती है। शà¥à¤°à¥€ पीतामà¥à¤¬à¤°à¤¦à¤¤ बडथà¥à¤µà¤¾à¤² ने संत शबà¥à¤¦ की वà¥à¤¯à¥à¤¤à¥à¤ªà¤¤à¤¿ शांत शबà¥à¤¦ से मानी है। शà¥à¤°à¥€ परशà¥à¤°à¤¾à¤® चतà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¥€ लिखते है कि संत शबà¥à¤¦ उस वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की और संकेत करता है। जिसने संत रà¥à¤ªà¥€ परम ततà¥à¤µ का अनà¥à¤à¤µ कर लिया हो और इस पà¥à¤°à¤•ार अपने वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ से उपर उठकर उसके साथ तदà¥à¤°à¥à¤ª हो गया है। जो संत अवरà¥à¤ª नितà¥à¤¯ सिदà¥à¤§ वसà¥à¤¤à¥ का साकà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤•ार कर चà¥à¤•ा हो वहीं संत है। संत साहितà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤µà¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• à¤à¤µà¤‚ अनà¥à¤à¥‚ति पà¥à¤°à¤µà¤£ है उसमें किसी शासà¥à¤¤à¥à¤° अथवा सिदà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤¤ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अगà¥à¤°à¤¹ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ नहीं हà¥à¤† है संत साहितà¥à¤¯ के सà¤à¥€ संत कवि साधनविहिन वातावरण में उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤ तथा वे à¤à¤¾à¤·à¤¾, वà¥à¤¯à¤¾à¤•रण आदि के अनà¥à¤¶à¥€à¤²à¤¨ से वंचित रहे। इसलिठउनके कावà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤·à¤¾ में परिषकार, परिमारà¥à¤œà¤¨, परिनिषà¥à¤ ता और साहितà¥à¤¯à¤¿à¤•ता नहीं है। परनà¥à¤¤à¥ उनके कावà¥à¤¯ में नैतिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ का निरà¥à¤ªà¤£, सतà¥à¤¯ का विवेचन à¤à¤µà¤‚ सतà¥à¤¯ का पà¥à¤°à¤šà¤¾à¤° पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤° उनकी कविता का मूल लकà¥à¤·à¥à¤¯ था। उनका धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ न कावà¥à¤¯ सौषà¥à¤ व की और थासंत कावà¥à¤¯à¤§à¤¾à¤°à¤¾ के दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤• - सांसà¥à¤•ृतिक आधार अनेक है। जिनमें से पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रà¥à¤ªà¥‡à¤£ उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है- उपनिषद, शंकराचारà¥à¤¯ का अदà¥à¤µà¥ˆà¤¤à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ नाथ पंथ, इसà¥à¤²à¤¾à¤® धरà¥à¤® तथा सà¥à¤«à¥€ दरà¥à¤¶à¤¨à¥¤ संत शबà¥à¤¦ का नाम आते ही हमारे मन में à¤à¤• साफ-सà¥à¤¥à¤°à¥€ व मनमोहक छवि आती है। शà¥à¤°à¥€ पीतामà¥à¤¬à¤°à¤¦à¤¤ बडथà¥à¤µà¤¾à¤² ने संत शबà¥à¤¦ की वà¥à¤¯à¥à¤¤à¥à¤ªà¤¤à¤¿ शांत शबà¥à¤¦ से मानी है। शà¥à¤°à¥€ परशà¥à¤°à¤¾à¤® चतà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¥€ लिखते है कि संत शबà¥à¤¦ उस वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की और संकेत करता है। जिसने संत रà¥à¤ªà¥€ परम ततà¥à¤µ का अनà¥à¤à¤µ कर लिया हो और इस पà¥à¤°à¤•ार अपने वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ से उपर उठकर उसके साथ तदà¥à¤°à¥à¤ª हो गया है। जो संत अवरà¥à¤ª नितà¥à¤¯ सिदà¥à¤§ वसà¥à¤¤à¥ का साकà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤•ार कर चà¥à¤•ा हो वहीं संत है। संत साहितà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤µà¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• à¤à¤µà¤‚ अनà¥à¤à¥‚ति पà¥à¤°à¤µà¤£ है उसमें किसी शासà¥à¤¤à¥à¤° अथवा सिदà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤¤ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अगà¥à¤°à¤¹ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ नहीं हà¥à¤† है संत साहितà¥à¤¯ के सà¤à¥€ संत कवि साधनविहिन वातावरण में उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤ तथा वे à¤à¤¾à¤·à¤¾, वà¥à¤¯à¤¾à¤•रण आदि के अनà¥à¤¶à¥€à¤²à¤¨ से वंचित रहे। इसलिठउनके कावà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤·à¤¾ में परिषकार, परिमारà¥à¤œà¤¨, परिनिषà¥à¤ ता और साहितà¥à¤¯à¤¿à¤•ता नहीं है। परनà¥à¤¤à¥ उनके कावà¥à¤¯ में नैतिक मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ का निरà¥à¤ªà¤£, सतà¥à¤¯ का विवेचन à¤à¤µà¤‚ सतà¥à¤¯ का पà¥à¤°à¤šà¤¾à¤° पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤° उनकी कविता का मूल लकà¥à¤·à¥à¤¯ था। उनका धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ न कावà¥à¤¯ सौषà¥à¤ व की और था
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