भारतीय संसà¥à¤•ृति में समनà¥à¤µà¤¯à¤µà¤¾à¤¦

कृश्णमोहन पाण्डेय

Abstract


भारतीय संसà¥à¤•ृति विशà¥à¤µà¤­à¤° की संसà¥à¤•ृतियों मैं समनà¥à¤µà¤¯à¤µà¤¾à¤¦ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से सभी संसà¥à¤•ृतियों की जनक हैं। संसà¥à¤•ृति का आधार धरà¥à¤® होता है और धरà¥à¤® का मूल वेद है ‘वेदोऽखिलो धरà¥à¤®à¤®à¥‚लमà¥à¥¤ वेदों में मनà¥à¤·à¥à¤¯ के धरà¥à¤® को जितने सà¥à¤‚दर और सरल शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ में उपसà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया गया है वैसा विशà¥à¤µà¤­à¤° के किसी भी साहितà¥à¤¯ में दà¥à¤°à¥à¤²à¤­ है। ऋगà¥à¤µà¥‡à¤¦ के अनेक मंतà¥à¤° समनà¥à¤µà¤¯à¤µà¤¾à¤¦ के पोषक हैं जो कालांतर में भारतीय संसà¥à¤•ृति के आधार सà¥à¤¤à¤‚भ बने हैं। वैदिक ऋषि मानवीय सभà¥à¤¯à¤¤à¤¾ के पोषण के काल में सब को सचेत करता है कि हे मनà¥à¤·à¥à¤¯à¥‹à¤‚ तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ साथ-साथ चलना है सबके साथ समान वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° करना है सब के अनà¥à¤•ूल वाणी बोलना है सब के अनà¥à¤•ूल आचरण करना है कोई à¤à¤¸à¤¾ आचरण नहीं करना जिससे किसी भी वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को तनिक भी कठिनाई या समसà¥à¤¯à¤¾ या दà¥à¤ƒà¤– उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हो, इस सारà¥à¤µà¤­à¥Œà¤®à¤¿à¤• विचारधारा का पोषण करने वाले भारतीय संसà¥à¤•ृति की आतà¥à¤®à¤¾ कहे जाने वाले वेद विशà¥à¤µà¤­à¤° की संसà¥à¤•ृतियों के लिठधरोहर हैं और सभी संसà¥à¤•ृतियों की आतà¥à¤®à¤¾ भी हैं।

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