हिंदी साहितà¥à¤¯ में नारी चितà¥à¤°à¤£

श्रीमती मनीषा

Abstract


नारी हर यà¥à¤— में साहितà¥à¤¯ सृजन की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ बनी है। नारी सिरà¥à¤« कोमल और सà¥à¤¡à¥‹à¤² काया का ही नाम नहीं बलà¥à¤•ि कोमल कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾à¤“ं का भी नाम है। नारी पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ भी है और जीने का सहारा भी। जब भी सौंदरà¥à¤¯ वरà¥à¤£à¤¨ की बात आती है तो बेशक वह नारी के सौंदरà¥à¤¯ के रूप में ही अभिवà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ होती है। जिस तरह पà¥à¤°à¤•ृति की सà¥à¤‚दरता को कोई नकार नहीं सकता उसी तरह नारी सौंदरà¥à¤¯ से भी कोई मà¥à¤‚ह नहीं फेर सकता। तन और मन की अदà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ सà¥à¤‚दरता के कारण ही नारी सौंदरà¥à¤¯ कभी चितà¥à¤°à¤•ार की कूची में, कभी कवि-कथाकार की लेखनी में, कभी मूरà¥à¤¤à¤¿à¤•ार के शिलà¥à¤ª में नजर आती है। 


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